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दुर्गा सप्तशती : Durga Saptsati

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, 
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते| 
समस्त  मिथिलावासी के लेल माँ दुर्गा के स्तुति हेतु श्री दुर्गा सप्तसती पोस्ट क रहल छी |  नवरात्री में श्री दुर्गा सप्तसती का नित्य पाठ करू  | माँ दुर्गा समस्त  मिथिलाक कष्ट हरैत आ समस्त मिथिलावासी के धन-धान्य से परिपूर्ण करैथ |
प्रेम से कहियौ जय दुर्गा माय की |
या देवी सर्वभूतेषू शक्तिरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

::: शिव तांडव स्तोत्र :::

मंत्र व स्तोत्र में बड़ी शक्ति होती है | स्तोत्र में अभीष्ट आराध्य की विशेष रूप में स्तुति होती है जो मानव के लिए शुभ फलप्रद मानी जाती है | प्रत्येक देवी देवताओं के विभिन्न मंत्र व स्तोत्र वेदों व पुराणों में उल्लेखित हैं | ऐसा ही एक स्तोत्र है शिवतांडव स्तोत्र जिसके माध्यम से आप न केवल धन सम्पति पा सकते हैं बल्कि जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं को दूर भी किया जा सकता है | शिवतांडव स्तोत्र लंकाधिपति रावण द्वारा रचा गया है, इसकी कठिन शब्दावली और अद्वितीय काव्य रचना इसे अन्य स्तोत्रों से अलग बनाती है |

मान्यता है की रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को हठी हुआ तो भगवान शिव ने अपने अंगूठे से तनिक सा दबाया तो कैलाश पर्वत पुन: वही अवस्थित हो गया | जिससे शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह पीड़ित हो उठा और भगवान शंकर से क्षमा करें क्षमा करें बोल स्तुति करने लग गया जो कालांतर में शिवतांडव स्तोत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई | जिसमें 17 श्लोक हैं।
शिवतांडव स्तोत्र द्वारा भगवान शिव की स्तुति से होने वाले लाभ निम्न है :-
1) शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को धन सम्पति के साथ साथ उत्कृष्ट व्यक्तित्व की प्राप्ति होती है |
2) आपके जीवन में किसी भी सिद्धि की महत्वकांक्षा हो तो इस स्तोत्र के जाप से आसानी से प्राप्त की जा सकती है |
3) इस स्तोत्र के नियमित पाठ से वाणी सिद्धि की भी प्राप्ति होती है |
4) नृत्य, चित्रकला, लेखन, योग, ध्यान, समाधी से जुड़े लोगों को शिवतांडव स्तोत्र का पाठ निश्चित लाभप्रद होता है |
5) शनि काल है और शिव महाकाल है अत: शनि से पीड़ित लोगों को इसके पाठ से लाभ मिलता है |
6) कालसर्प से पीड़ित लोगों को इस स्तोत्र के पाठ से काफी हद तक मुक्ति मिलती है |
शिवतांडव स्तोत्र- :


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥१॥

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकमस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

शिव चालीसा (मैथिली मे)

शिव चालीसा (मैथिली मे)
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान॥
कहय अयोध्यादास प्रभु, दियौ अभय वरदान॥


जय गिरजापति दीनदयाला, सदा करी सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चंद्रमा सोहय नीके, कानन कुंडल नाग फनीके॥
अंग गौर शिर गंग बहाबी, मुंडमाल तन छाउर लगाबी॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहय, छवि केँ देखि नाग मन मोहय॥
मैना मातु केर वैह दुलारी, वाम अंग सोहथि छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहय छवि भारी, करी सदा शत्रुन क्षयकारी॥
देवगण जखनहि केलैन पुकार, तुरतहि दुःख प्रभु कैल निवार॥
केलक उपद्रव तारक भारी, देवगण मिलिकय अहींकेँ गोहारी॥
तुरत षडानन अहीं पठायल, लव निमेष मे मारि खसायल॥
अपने जलंधर असुर संहारल, सुयष अपन संसार पसारल॥ 


त्रिपुरासुर संग युद्ध मचायल, अहींक कृपा सब ईश बचायल॥
केलनि तप जे भागीरथ भारी, कैल प्रतिज्ञा पुर त्रिपुरारी॥
दानी नहि कियो अहाँ समाना, सेवक स्तुति करय जहाना॥
वेदो महिमा अहींकेर गायल, अकथ अनादि भेद नहि पायल॥
प्रगट उदधि मंथन मे ज्वाला, जरय सुरासुर भेल बेहाला॥
करैत दया अहाँ कैल सहाय, नीलकंठ एना नाम कहाय॥
पूजन रामचंद्र जे केला, लंका जीति विभीषण देला॥
सहस कमल मे भेल जे धारी, कैल परीक्षा अपने त्रिपुरारी॥
एक कमल प्रभु राखल गोही, कमल नयन पूजय लेल ओहि॥
कठिन भक्ति देखथि प्रभु शंकर, होइथ प्रसन देथि इच्छावर॥


जय जय जय अनंत अविनाशी, करू कृपा सबपर घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोरे सतावय, भ्रमैत रहय मोरा चैन न आवय॥
त्राहि त्राहि हम नाथ पुकारी, एहि अवसर मोरा अहीं ऊबारी॥
ली त्रिशूल शत्रु सब मारू, संकटसँ मोरा शीघ्र निवारू॥
मातु पिता भरता सब होउ, संकट मे पूछय नहि कोउ॥
स्वामी एक बस आश अहींकेर, हरू हे हर भारी संकट बेर॥
धन निर्धन केँ देल सदा जे, जे किछु चाहल वैह फल ले॥
स्तुति कुन विधि करी अहाँकेँ, क्षमा करू प्रभु चूक जहाँकेँ॥
शंकर हे संकट केर नाशक, मंगल करू हे विघ्न विनाशक॥
योगी यती मुनि ध्यान लगावथि, नारद शारद शीश नमावथि॥


नम: नम: जय नम: शिवाय, सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जे ई पढैथि मन अहींमे लगाय, तिनका पर सदा शंभु सहाय॥
ऋणियाँ जे कियो हो अधिकारी, पाठ करय ओ पावन हारी॥
पुत्रहीन करय इच्छा जेना, निश्चय शिव प्रसाद से लेना॥
पंडित त्रयोदशी दिन आनय, ध्यानपूर्वक होम करावय॥
त्रयोदशी व्रत करय हमेशा, तन नहि रहय कोनो कलेशा॥
धुप दीप नैवेद्य चढावय, शंकर सन्मुख पाठ सुनावय॥
जनम जनम केर पाप नसावय, अन्त वास शिवपुर मे पावय॥
कहल अयोध्यादास अहाँकेर, जानि सकल दुःख हरू जहाँकेर॥


दोहा:
नित्य नाम ली प्रातहि पाठ करी चालीस॥
अहीं हमर मनोकामना पूर्ण करू जगदीश॥१॥
मगसर छठी हेमंत ऋतू संवत चौसठ जान॥
स्तुति चालीसा शिव केर पूर्ण करय कल्याण॥२॥ 


(हिन्दीमे उपलब्ध चालीसाक रूपान्तर - त्रुटि लेल क्षमा-प्रार्थनाक )