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Vidyapati - अभिनव कोमल सुन्दर पात।

अभिनव कोमल सुन्दर पात 
सगर कानन पहिरल पट रात !
मलय -पवन डोलय बहु भांति
अपन कुसुम रसे अपनही माती !!

देखि-देखि माधव मन हुलसंत।बिरिन्दावन भेल बेकत बसंत।।
कोकिल बोलाम साहर भार।
मदन पाओल जग नव अधिकार।।
पाइक मधुकर कर मधु पान।
भमि-भमि जोहय मानिनि-मान।।
दिसि-दिसि से भमि विपिन निहारि।
रास बुझावय मुदित मुरारि।
भनइ विद्यापति ई रस गाव।
राधा-माधव अभिनव भाव।।

अभिनव पल्लव बइसंक देल।

अभिनव पल्लव बइसंक देल।
धवल कमल फुल पुरहर भेल।।
करु मकरंद मन्दाकिनि पानि।
अरुन असोग दीप दहु आनि।।
माह हे आजि दिवस पुनमन्त।।
करिअ चुमाओन राय बसन्त।।
संपुन सुधानिधि दधि भल भेल।
भगि-भगि भंगर हंकराय गेल।।
केसु कुसुम सिन्दुर सम भास।
केतकि धुलि बिथरहु पटबास।।
भनइ विद्यापति कवि कंठहार।
रस बझ सिवसिंह सिव अवतार।।



अम्बर बदन झपाबह गोरि। 

अम्बर बदन झपाबह गोरि।
राज सुनइ छिअ चांदक चोरि।।
घरे घरे पहरु गेल अछ जोहि।
अब ही दूखन लागत तोहि।।
कतय नुकायब चांदक चोरि।
जतहि नुकायब ततहि उजोरि।।
हास सुधारस न कर उजोर।
बनिक धनिक धन बोलब मोर।।
अधर समीप दसन कर जोति।
सिंदुर सीम बैसाउलि मोति।।
भनइ विद्यापति होहु निसंक।
चांदुह कां किछु लागु कलंक।।


Vidaypati - तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा बालक ठाढ़ छै

तिलक लगोउने धनुष कांह पर दुटा बालक ठाड़ छै
घुमी रहल छै जनकबाग में फूल तोरैठ लेल ठाड़ छै
श्याम रंग जे सबसँ सुन्दर से सबहक सरदार छै 
नाम पुछई छै राम कहै छै अवध के राजकुमार छै
धनुष प्रतिज्ञा कैल जनक जी के पूरा कहनिहार छै 
देश - देश के नृप आबी क  धनैत अपन कघर छै 
कियो वीर नै बूझी परै जछी तं जनक के धिक्कार छै 
ऐतबा सुनीत ही बजला लक्ष्मण ई कोन कठिन पहार छै
बूझबा मे नही ऐल्हीन जनक के एही ठाम शेषावगर छै
चुटकी में नहीं ऐलकिन जनक के एही ठाम शेषावगर छै
चुटकी सँ मली देब धनुष के ई त बर निस्सार छै
उठी क विश्वामित्र तखन सँ रा के करैत ठाड़ छै
जखन नहीं राम उथोल्हीं धनुष मच गेल जय -जय कार छै
धन्य राम छठी धन्य लखनजी जनैत भरी संसार छै
साजी सखी के संग सियाजी हाथ लेने जयमाल छै
तिलक लगौने धनुष कान्ह पर दुटा बालक ठाड़ छै !
                                                                                        ---- विद्यापति ठाकुर 

Vidyapati - बिसहरि गीत

कोन  मास नागपंचमी भेल 
राम घरे -घरे बिसहरी पूजा भेल 
काहुक घर बिसहरी दूध लाबा लेल 
राम काहुक घर बिसहरी खीर भोजन लेल 
भगता घर बिसहरि दूध लाबा लेल
राम सेबक घर बिसहरि खीर भोजन लेल
सावन मास नागपञ्चमी भेल
राम घर-घर बिसहरि पूजा लेल
जोरा छागर देब दन्त पान
राम बनहि देब घरबा करु विश्राम
बेलपत्र हरियर अरहुल लाल
राम चम्पा फूल फूलय माँ के
गला ग्रिमहार
पहीर ओढि मईया फड गेली ठाढि
राम सूर्यक ज्योति मलीन इड जाय
भनहि विद्यापति बिसहरि माय
राम सब दिन सब ठाय रहब सहाय
पीयर अंचला बिसहरि के लाम्बी-लाम्बी केस
राम अही बाहे जेती बिसहरि तरहुत देस
आंहु के सिंगार बिसहरि लाबा-दूध
राम हमर सिंगार अछि गोदी भरि पूत
तेल दे तेलिया भाई
दीप दे कुम्हार
राम बाती दे रे पटबा भैय
लेसब प्रहलाद
लागल दिया दयकि गेल बाती
राम खेलड लगली बिसहरि माय चारु पहर राति
भनहिं विद्यापति सुनु हे महेश
राम गौरी दाय के पांचो बेटी
हरथि कलेश

Vidyapati - बारहमासा

साओनर साग ने भादवक दही।
आसिनक ओस ने कार्तिकक मही।।
अगहनक जीर ने पुषक धनी।
माघक मीषरी ने फागुनक चना।।
चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल।
जेठक चलब ने अषाढ़क बेल।।
कहे धन्वन्तरि अहि सबसँ बचे।
त वैदराज काहे पुरिया रचे।।
चानन रगड़ि सुहागिनी हे गेले फूलक हार।
सेनुरा सँ संगिया भरल अछि हे सुख मास अषाढ़।।
राजा गेलाह मृग मारन हे वन गेलाह शिकार।
जोगी एक ठाढ़ अंगना में हे रानी सुनि लीय बात हमार।।
द दिय भीक्षा जोगी के हे ओ त छोड़ता द्वार।।
सावन बड़ा सुख दावन हे दु:ख सहलो ने जाय।
इहो दुख होइहन्डु रानी कुब्जी के जो कन्त रखली लोभाय।।
भादब भरम भयावन हे गरजै ढ़हनाय
सबके बलम देखि घर में हे ककरा संग जाय
आसिन कुमर आबि गेल हे कि ओ आब ने जिथि
चीढ्ढी में लीखल वियोगिया हे हजमा हाथे देब
कातिक परबहिं लागि गेल हे गोरी-गंगा-स्नान
गंगा नहाय लट झारलऊँ हे सीथ लागे उदास
अगहन सारी लबीय गेल हे फुटि गेल सब रंग धान
प्रभुजी त छथि परदेसिया हे कियो भोगत आन
पुसहिं ओसहिं गिड़ि गेल हे भीजि गेल लाम्बी-लाम्बी केस
केसब सुखाबी ओसरबा हे सीथ लागे उदास
माघहि मास चतुर्दशी हे शीब-ब्रत तोहार
घुमि-फिरि अचलऊँ मन्दिरबा हे चित लागय उदास
फागुन फगुआ खेलबितऊँ हे निरमोहिया के साथ
प्रभुजी के हाथ पीचकारी हे उड़िते अतरी गुलाब
चैतहिं बेली फूलाय गेल हे फूलि गेल कुसुम गुलाब
फूलबा के हार गुथबितहुँ हे भेजितऊँ प्रभु के सनेश
वैसाखहिं बंसबा कटबितऊँ हे रचि बंगला छेबाय
ओहि दे बंगला बीच सुतितऊँ हे रसबेनिया डोलाय
जेठहिं मास भेंट भा गोल हे पिरि गेल बारह मास
प्रभुजी त एला जगरनाथ हे कन्त लीय समुझाय।।

चैत मास गृह अयोध्या त्यागल हानि से भीपति परी
अलख निरञ्जन पार उतरि गेल तपसी के वेश धरी
हो विकल रघुलाथ भये.....
कहाँ विलमस हनुमान विकल रघुलाथ भये।
धूप-दीप बिनु मन्दिर सुन्न भैल मास बैसाख चढ़ी
सीमा बीना मन्दिर भेल सुना बन बीच कुहकि रही
कहाँ विलमल हनुमान.....
जेठ वान लगे लछमन के धरनी से मरक्षि खसी
वैद्य सुखेन बताबय श्रीजमणि तब लछमन उबरी
हो विकल रघुनाथ भये.....
कहाँ विलमल हनुमान.....
राम सुमरि बीड़ापान उठायल धवलगिरि चली
मास अषाढ़ घटा-घन घहरे राम सुमरिक चली
हो विकल रघुनाथ भये.....
कहाँ विलमल हनुमान.....
साबन सर्व सुहावन रघुबन सजमनि लेख न पटी
दामिनि दमके तरस दिखाबे जब मोन सब घबरी
हो विकल रघुनाथ भये.....
कहाँ विलमल हनुमान.....
भादब परबत भोर उखारल बुन्दक मार परी
निसि अन्धयारी पंथ नहिं सूझल राम सुमरि क चली
हो विकल रघुनाथ भये.....
कहाँ विलमल हनुमान.....
आसिन मास देखे रघुबर जी देखि लथुमन हहरी
सीता सोचती सोचे रघुबरजी लछुमन सुधि बिसरी
हो विकल रघुनाथ.....
कहाँ विलमल हनुमान.....
अगहन रघुबर आशिष मांगथि हर्षित सब भई
ओहि अबसर अञ्जनिसुत अचला सब मोन हर्षित भई
हो विकल रघुनाथ भये.....
कहाँ विलमल हनुमान.....
अगहन दिन उत्तम सुख-सुन्दर घर-घर सारी समाय
रतन बयस सँ मोन सुख सुन्दर से छोड़ने कोना जायव
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
पूष कोठलिया ऊँच अटरिया, तकिया तुराय
अतर, गुलाब, सेन्ट गमकायब अतेक मजा कहाँ पाएब
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
माधक सेला सचे हूमेला जैब बिदेसर धाम
पान सुपारी जरदा खाएब घुमब शहर बजार
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
फागून फगुआ दूनू मिली खेलब घोरब रंग अबीर
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
अतर गुलाब, सेन्ट गमकाएब घोटि-घोटि धारब अबीर
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
चैतहिं बेली फुलय बनबेली, अद फुलय कचनार
सेहो फूल लोढि-लोढि हार बुनाएब भेजब पीयाजी के पास
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
बैसाखक ज्वाला करे मोन ब्योला सोने मुढी बेनिया डोलारब
कोमल हाथ सँ बेनिया डोलाएब अतेक मजा कहाँ पाएब
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
जेठहिं कान्त कतय गमाओल आयल अषाढ़क मास
लाल रे पलंगिया घरहिं ओछाएब सेवा करब अपार
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
सावन-भादब के मेघबा गरजै जुनि मेघ बरसु आजु
कोना क बालमु पार उतरताह नै रे नाव करुआर
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
आसिन-कातिक के पर्व लगतु हैं सब सखी गंगा-स्नान
बिना बालमुजी के नीको ने लागय
पुरि गेल बारह मास
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब.....
चोआ चानन अंग लगाओल कामीनि कायल किंशगार
जे दिन मोहन मधउपुर गेलाह से दिन मास अखाढ़ रे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
उधो बारि रे बयस बीतल जाय
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
एक त गोरी बारी बयसिया
दोसर पीया परदेशिया
तेसर बून्द झलामलि बरसै
साबन अधिक कलेश
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
भादब हे सखी मरम भयाबन
दोसर राति अन्हार
लाका लौके बीजुरी चमके
ककरा मड़ैया हैब ठाढ़
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
आसिन हे सखि आस लगाओल
आस ने पुरल हमार
आसो जे पुरलन्हि कुब्जी सौतिनियाँ के
जे पाहुन रखल हमार
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
कातिक हे सखी पर्व लगत है
सब सखी गंगास्नान
सब सखी मीली गंगा नहाबीय
बीना पीया पर्व उदास
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
अगहन हे सखी सारी लबीय गेल
लबि गेल लोचन मोर
चिदई-चुनमुन सुखहिं खेपय
हम धनी बीरहा के मात
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
पुंसहिं हे सखी ओस खसथु हैं
भीजी गेल लाम्बी केस
सब रे सखी मीली सीरक भरेलऊँ
बीनु पीया जारो ने जाय
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
चैत हे सखी बेली फुलि गेल
फुलि गेल कुसुम गुलाब
ओहि फूलबा के हार गुथबितऊँ
मेजितऊँ पहुँजी के देस
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
बैसाख हे सखी गरमी लगतु हैं
सब सखी बंगला छेबाय
सब के सखी सब बंगला छबाइहो
बीनु पीया बंगला उदास
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
जेठ हे सखी भेंट भय गेल
पुरि गेल बारह मास
हे कन्हैया के मनाय ने दीप.....
प्रीतम हमरो तेजने जाइ छी परदेशिया यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना.....
एक त साबन बीत गेल
दोसर भादब बीत गेल
तेसर बीतल जाइछै आसिन सन के मास यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना.....
कार्तिक चिठ्ठिया लीखाएब
अगहन पीया के मंगायब
पुस कुसलों ने बुझलऊँ परदेशिया यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना.....
माघ सीरक भरायब
फागून फगुआ खेलाएब
चैत चीतयो ने रहतई थीर यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना.....
बैसाख साड़ी हम रंगायब
जेठ पहीर पीया घर जायब
अखाढ़ बेनिया डोलाएब उमरेस में
धरबै जोगनीक भेष यौ ना.....
असाढ़ पुरि गेल बारह मास यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना.....

Vidyapati Geet -जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि

जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि
पशुपति भामिनी माया
सहज सुमति कर दियउ गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया
वासर रैनि सबासन शोभित
चरण चन्‍द्रमणि चूड़ा
कतओक दैत्‍य मारि मुख मेलल
कतओ उगिलि कएल कूड़ा
सामर बरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फुलकोका
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि
लिधुर फेन उठ फोंका
घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय
हन-हन कर तुअ काता
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरू जनि माता